Thursday, 6 January 2022

बुराँश के फूल - किताब

 


बुराँश के फूल , पहाड़ों की कहानियाँ है।  सुःख है , दुःख है।   रीति - रिवाज है और बहुत सारा पहाड़ है।   पढ़ियेगा , किताब अमेज़न पर उपलब्ध है।  

Thursday, 28 January 2021

कुमाउँनी ग़ज़ल

 

 

ह्यू पड़ो डाना डाना ऊजाव पट हेगे यौ जुन्याली रात। 

स्वामी म्यरा परदेसा कहा कू सूवा अब दिलेक बात ।।

 

बूढ़ी ईजा रोज पूछू काश छीन वीक च्यलाक हाल।

नानतिन रोज़ बाट देखनि कब आल पूछनी बार बार ।।

 

पहाड़ जीवन कठोर जस डासी डुंग धरि रु गाड़।

दिन तो काटी जानी पराण उदेखि जस पुसेक रात ।।

 

तुम्हेर दिगे बितायी पल भोते ऊनि याद।

जाड़ कुठरी जा जस ढकी रयी कमोय सात।।

Saturday, 23 January 2021

कुमाउँनी शेर

 -1-

खुट उदेगे फैलूंण चैनी ज्यदु चद्दर छू।  

नंगेड़े खुटो को ठण्ड बहुत लागू। 

-2-

मैस पाख मी चढ़नी तो आपुण धुरी मी नि चड़न चे। 

चड़न तो आसान हूँ हुलेरण फगे भोते दिक्कत है जे।  

-3-

पहाड़ जय्दू भाल देखनि भतेर उदुके दर्द छिपे रूनी। 

आपुण पीड़ दर्द ऊ फिर गाड़ गधेरो कुणी बतनुहि।।

-4

जो पहाड़ ज्यदु ठुल हूँ विक गहराई ले उदेगु हूँ। 

आसमां हू बात करछो पाताल तक टिकी हूँ।। 

-5-

नि छेड़ ला -सीध साध हुनि पहाड़ी शेणी मैस। 

छेड़ी गया फिर भैंस की तीस वाई उनेर रीस।  


Thursday, 14 January 2021

कुली बेगार प्रथा और उत्तरायणी - 14 जनवरी 1921

 


उतरैणी कौतिक , सरयू और गोमती  का बगड़ ,

लिया पहाड़ ने एक प्रण - लेकर हाथ में सरयू का जल ,

ख़त्म करेंगे अब गुलामी , चाहे हो जाये अब रण ,

ठगना बंद करेंगे अँग्रेजो का , चालीस हजार आवाजे उठी एक संग ,

बहा दिए रजिस्टर , किया घोर शंखनाद

बद्री दत्त पांडेय जी ने भरी एक हुँकार ,

बहा ले गयी सरयू -ख़त्म समझो कुली बेगार ,

हतप्रभ "डायबल" चौंक उठा , घमंड उसका चूर हुआ

कुमाऊँ के बागेश्वर में "रक्तहीन क्रांति " का पहला आगाज हुआ।

 

नमन , अभिनन्दन और वंदन - बागनाथ जी ,

गोमती के तट को , सरयू के जल को ,

कुमाऊं को , गढ़वाल को ,

उतरैणी कौतिक को , उस बगड़ को ,

शामिल हरेक जन को ,

सौ साल बीत गए , मगर , मत भूलिए क्रांति के उस पल को ,

मनाते रहिये उतरैणी कौतिक को। 

 

Friday, 8 January 2021

पहाड़ो की एक शाम

सूरज उत्तर रहा धीरे धीरे , 

जाने को तैयार उस पहाड़ से नीचे , 

गाय बैल सब वापस लौट रहे , 

"खट्ट खट्ट" उनके खुर बोले , 

हाँकता ला रहा मुन्ना , 

एक गाय की पूँछ मरोड़े , 

एक बुढ़ी अम्मा धारे में , 

पानी की गागर भरे , 

घर की बहू , 

क्या पकाना है सोचे , 

कुछ लोग लौट रहे दुकानों से , 

जैसे कुछ बड़ा काम करके लौटे , 

छिलुके कुछ इक्कट्ठा कर , 

घर की बड़ी बिटिया चूल्हा झोंके ,

शिवालय का घंटा बजे , 

घस्यारान के गठव बंधे , 

ऊँचे डानो में अब घाम बचा , 

दूर हिमालय अपना रंग बदले, 

थके हारे सब पशु , पक्षी , नर नारी 

अपने अपने घर लौटे , 

बस थोड़ी देर में अब ये दिन , 

रात को हवाले कर पहाड़ो में ढले।     

होती होंगी शाम जवाँ कही , रंगीन रातें कहीं , 

पहाड़ो में शाम उदास और राते खामोश ही होती है।   


Sunday, 6 September 2020

लोहार और आफर


 जब चीड़ के बगेटो से ,

आग निकलती थी ,

वो हाथ से पहिया घूमता था ,

जो हवा देता था बगेटो  को ,

बगेटो की वो आग ,

लोहे को "अद्भुत लाली " देती थी ,

और आफर फिर लोहा भी नरम कर देता था ,

फिर बनाता था वो दराती , हल के फाल

और धार देता था कुल्हाड़ी और बढियाट में ,

पता था उसको किसमे कितनी धार देनी है ,

और किस में कितना बड़ा -छोटा , मोटा -पतला बीन देना है ,

किसके घर के बैलो में कितनी ताकत है,

उसी हिसाब से ढालता था हल की फाल । 

 

कहते है अनपढ़ था वो ,

दुनियादारी से अनजान ,

उसने सीखा था अपने पुरखो से ये  हुनर ,

लोहा मुड़ता था उसके इशारो पर ,

गर्म लोहे को पीटकर ,

जब वो पानी में भिगोता था ,

" छै" की आवाज से लोहा भी ,

उसके हुनर के गुण गाता था। 

 

मगर अब न आफर है , न लोहार

सब मशीनों से बनने लगे है ,

दराती  , बढियाट्ट , और हल के फाल ,

सब एक जैसे , एक जैसी धार ,

एक जैसे बीन - बिना ख्याल किये ,

किसका हाथ छोटा , किसका हाथ बड़ा ,

किसके घर के बैल ताकतवर  ,

और किसके कमजोर ,

क्यूंकि मशीन नहीं समझती भावनाओ को ,

उसके लिए सब बराबर ,

लोहार समझता था मगर ,

इस दौर में अब किसको है उसकी कदर।  

Monday, 20 July 2020

पहाड़ो में सावन


सावन में जब आकाश से , 
मेघो की फुहार बन बूँदे गिरती है , 
रिमझिम जब ये कई दिनों तक , 
बरसती रहती है , 
होना तो रूमानी चाहिए इस मौसम में , 
मगर पहाड़ में  चिंता लगी रहती है , 
न जाने कहाँ अब बादल फट जाए , 
न जाने कहाँ से छत चूँ जाये , 
न जाने कौन सा गधेरा उफान मारे , 
न जाने नदी इस बार कौन सा खेत बहा ले जाये , 
न जाने अब जंगल से चारा कैसे लाया जाये , 
न जाने कैसे गीली लकड़ियों से आग जलाई जाये ,
न जाने कहाँ से पहाड़ खिसक आये ,
न जाने कौन सा जानवर फिसलते रास्तो में घुरी जाये , 
न जाने कौन सा रास्ता इस बार बह जाये।  

पहाड़ो का सावन हरियाली तो लाता है , 
मगर ब्याज में बहुत कुछ छोड़ जाता है , 
गिरे  पहाड़ , 
टूटी सड़के , 
आधे खेत , 
टपकती छत , 
और सावन की बीतने की कामना करते , 
तमाम पहाड़ी लोग, 
पहाड़ो में सावन , 
रूमानी कम , डरावना ज्यादा होता है।