Thursday, 8 August 2019

सुषमा स्वराज ने 2002 में कहा था- रानीखेत मेरा मायका है ।



पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी पंचतत्व में विलीन हो गयी और पीछे अपनी अनगिनत यादें छोड़ गयी।   राजनीतिज्ञ होने के साथ साथ उन्होंने भारतीय महिला का जो रूप प्रस्तुत किया , वो यकीनन अनुकरणीय है।   2002 में चुनाव प्रचारो में वो रानीखेत भी आयी थी और जब रानीखेत में उनका परम्परागत स्वागत किया गया और पिछौड़ा ओढ़ाया गया तो वो सहसा बोल उठी - " रानीखेत तो मेरा मायका हो गया। "  यह फोटो अपने आप में सहस्त्र शब्दों के बराबर है।  

" नश्वर शरीर है , एक दिन सबको जाना है। 
   कितने दिलो में घर कर गए , यही महानता का पैमाना है।।"  

फोटो साभार - गूगल 

Sunday, 7 July 2019

हरेला पर्व


हमारा उत्तराखंड अपने लोक पर्वो के लिए विख्यात है।   प्रकृति से जुड़े बहुत से लोक पर्वो में से एक महत्वपूर्ण पर्व है - हरेला।   हरेला यानि हरियाली।   17 जुलाई को पड़ने वाले हरेले पर्व की शुरुवात आज हरेला बोने से हो जाएगी और फिर दसवे दिन इस हरेले को काटने के साथ " हरेला पर्व" संपन्न हो जायेगा।  हरेले से दस दिन पहले " हरेला " बोया जाता है। 
रिंगाल की टोकरी या लकड़ी के पटले को साफ़ किया जाता है।   मिटटी को छान लिया जाता है।  फिर मिटटी , बीज , मिटटी , बीज की प्रक्रिया को छः या सात बार दोहराया जाता है।  सात प्रकार के अनाज - जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट बोये जाते है और फिर इससे सूर्य की रौशनी से दूर मंदिर या घर के साफ़ कोने में रख दिया जाता है।  रोज़ फिर थोड़ा थोड़ा पानी देकर सिंचित किया जाता है।   तीन - चार दिन बाद ही बीज अंकुरित हो जाते है और फिर धीरे धीरे पीले पौधे पनप जाते है।   पीले पत्तियां और सफ़ेद तनियाँ - हरेले को मोहक बना देती है।   बचपन में हम गाँव में " किसका हरेला " ज्यादा बढ़ गया है , घर घर चक्कर लगाते थे।   दसवे दिन इसी हरेले को पतीसा या काटा जाता है।   आज भी परम्परा है की " हरेला " परिवार में एक ही जगह बोया जाता है , भले ही परिवार के सदस्य अलग अलग स्थानों में ही क्यों न रहते हो। 

लोक पर्वो में " हरेले " का अपना एक उच्च स्थान है।  यह पर्व मंगल कामनाओ का पर्व है , हरियाली का पर्व है और प्रकृति के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का पर्व है।  पहाड़ो में सावन  के आगमन का प्रतीक है और बड़े - बुजुर्गो से मिलने वाली आशीष का पर्व है। 

जी रये, जागि रये..धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये..सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो..दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये'

ईश्वर से कामना है - आपका जीवन हरा भरा रहे। 

Wednesday, 26 June 2019

चलो , सँवारे अपना उत्तराखंड


अपनी भूमि , अपना प्रदेश
अपना गाँव , अपना घर
मिलजुलकर आओ सब ,
सँवारे अपना उत्तराखंड। 

जन्मे भाग्य से इस भूमि पर  ,
देवलोक सा हमारा उत्तराखंड ,
नदियाँ , झरने, घने जंगल
प्रकृति का वरदान उत्तराखंड। 

भुला दिया है हमने ,
बाकी है हमपर इसका ऋण ,
समय आ गया अब ,
उन्नति की राह चले मेरा उत्तराखंड। 

एक से अनेक बने ,
अनेको से ताकत मिले ,
सर्वत्र विकास के पथ पर ,
अपना उत्तराखंड चले। 

आओ की अब खुद पहल करे , 
प्रकृति के इस उपहार को , 
फिर से देवभूमि बनाये ,
जैसे भी हो , प्रयास करे।  
चलो , सँवारे अपना उत्तराखंड।  

Thursday, 30 May 2019

कचकचाट



आम्म बुबु कचकचाट , 
नान्तिनो यौ नि करो , 
ऊ नि करो , 
नि करो ज्यादेक मिजात , 
बचे बेर धरो डबल , 
बाजी बखत आल काम।  

राति जल्दी उठो , 
करो कुछ काम , 
ज़िन्दगी इसकये नि कटन , 
गवुण  पड़नी शरीरक हाड़।  

उदेकु खाओ जदु भूख छू , 
अन्न नि करो बर्बाद , 
टीवी , मोबाइल ज्यादेक नि देखो , 
आँख है जानी खराब।  


( मिजात - फैशन , बाजी बखत - बुरा समय, गवुण - गलाना, उदेकु - उतना ही , जदु - जितना  , डबल - पैसे  ) 

Friday, 10 May 2019

कसी भूलू आपुण पहाड़ो कू



कसी भूलू आपुण पहाड़ो कू ,
ऊ ठंड ठंड हाव ,
ऊ नौव पाणी ,
ऊ ताल माल बखाई ,
ऊ गोलज्यू थान ,
ऊ ऊँच नीच बाट ,
ऊ पन दा चाहेक दूकान ,
ऊ काकड़ेक झाल ,
ऊ मड़ुआ रवाट,
ऊ काफ़लेक स्वाद ,
ऊ आम्म बुबु फसक ,
ऊ धार मी घाम ,
ऊ बाँजेक बुझाणि स्योव ,
बता दी भुला ,
कसी भूलू आपुण पहाड़ो कू। 

ऊ दमुआ और निशाण ,
ऊ झोड़ा चाँचरी ,
ऊ छोलिया नृत्य ,
ऊ बीन बाजोक तान ,
ऊ जागर मी हुड़केक थाप ,
ऊ पत्तल मी आलू गोभी साग ,
ऊ एच पेच ,
बता दी भुला ,
कसी भूलू आपुण पहाड़ो कू।

Wednesday, 17 April 2019

जे ले हौल , देखिनि रौल।




कै बाते चिंता , कै बातें फिक्र 
जो कर्म आपुण हाथ मी छीन , 
करते जाओ , बाकि 
जे ले हौल , देखिनि रौल।   

मेहनत करण मी नि घबराओ , 
बंजर स्यार मी हौ तो चलाओ , 
दौ पाणी चिंता तुम नि करो , 
जे ले हौल , देखि जाल।  

नान्तिनो कू तुम पढ़ाओ , 
भाल संस्कार उनकू दौ , 
बकाई उनैर किस्मत भई ,
जे ले हौल , देखिनि रौल।   

चिंता फिक्र ज्यादेक नि करो , 
तबियत आपुण नि बिगाड़ो , 
कर्मो फल जरूर मिलाल , 
जे ले हौल , देखिनि रौल।  

समयेक फेर चलते रुनी , 
कभते  घाम , कभते दौ लागि रूनी 
समयक दिगे कदमताल करि जाओ ,
जे ले हौल , देखिनि रौल।  

सुःख दुःख तो उने -जाने रौल , 
ठंड बाद गर्मी उने रौल , 
ज्यादेक चकबकाहट क्ये देखूण हरौ , 
जे ले हौल , देखिनि रौल।  


जे ले हौल , देखिनि रौल - जो होगा , देखा जायेगा 

Friday, 5 April 2019

दाज्यू , आपुण पहाड़ देख जाओ।



गर्मी एगे दाज्यू ,
अब ए जाओ पहाड़ ,
ठंडी हवा ,
ठंडो पाणी ,
खोल जाओ ,
आपुण घराक द्वार। 

गौव -गाढ़ भेट जाओ,
दव्याप्त आपुण पूज जाओ ,
काफो - हिसाव खे जाओ ,
नान्तिनुकू पहाड़ दिखे जाओ,
शहरो मी ताती जाला ,
यौ गर्मी पहाड़ काटी जाओ। 

गौव -गौव उजाड़ हेगी ,
ज्यादातर घरकु ताई लटक गी ,
खौव मी दूब जामगो ,
मंदिर मी दीय  जगाई म्हणो हेगो,
कुछ दिन ऐ जाओ ,
दाज्यू , आपुण पहाड़ देख जाओ।