Tuesday, 26 March 2019

सीख



सब पाख में चढ़नी
तो आपुण धूरि मी नि चड़न चेन ,
आपुण चद्दर देख बेर ,
खुट फैलुन चेन। 

जमान बढ़ दिखावटी एगो ,
दुहौर कू देखबेर ,
आपुण रंग ढंग नि ,
बदौव चेन। 

मेस भौते बदल गी अब ,
उनौर बात सुणी बेर ,
आपुण  घरेक सुखचैन ,
नि बिगाड़न चेन।  

आपुण कर्म भौल करो ,
फिर के चिंता नेह ,
फलेक चिंता भगवान करौल ,
बढ़िया नीन उड़ चेन।



पाख - छत , धूरि - छत पर बनी चिमनी , बदौव - बदलना, दुहौर - दूसरे को , फैलुन - फैलाना , मेस - लोग , सुणी - सुनने , बिगाड़न – बिगाड़ना, भौल - अच्छे , करौल- करेगा , नीन - नींद

Thursday, 14 March 2019

फूलदेई




घरबार आबाद रौ ,
देई बट्टी सुख और संपत्ति ,
फूल चढूनी आज हम ,
पूर साल तुम्हौर बड़ी रो। 

आशीष हमकू ले दियो ,
दूब जस फैलो ,
आकाश जस विशाल ,
पर्वत जस ऊंच रो। 

तुम्हौर देई कू भेटने रो ,
गौव गाड़ म्योर हरी भरी रो ,
हम नानतिन खेलन रो ,
सबु कुशल मंगल है रो। 

गौव बूढ़ बाड़ी स्वस्थ रो ,
देश परदेश सब कुशल रो ,
हँसने रइया साल भर ,
के कष्ट नि ओ। 

Thursday, 7 March 2019

कुमाउँनी होली - फौजियों के नाम



हो , हो , हो , हो !
घर बार छोड़ी , नानतिन पिछाड़ छोड़ी
बॉर्डर मी देशेक रक्षा लीजी राइफल थामी ,
म्यार देशेक फौजियों तुम्हौर गुण गानी। 
हो , हो , हो , हो

धर्म तुम्हौर देशेक रक्षा ,
कर्म तुम्हौर देशक रक्षा ,
दुश्मनो दीबे खार खानी ,
म्यार देशेक फौजियों तुम्हौर गुण गानी।
हो , हो , हो , हो !

ज्यान हथेली मी धरी ,
ह्यून -बरसात - गर्मी ,
सब मौसमो मी ठाड़ रूनी ,
म्यार देशेक फौजियों तुम्हौर गुण गानी।
हो , हो , हो , हो !

तुम्हौर वीरता देख्बैर दुश्मण कामनि ,
तेज देख्बैर सूरज शर्मानी ,
घरवाल तुम्हौर रोज राह देखनी ,
म्यार देशेक फौजियों तुम्हौर गुण गानी।
हो , हो , हो , हो !


फोटो साभार - गूगल 

Monday, 25 February 2019

एक जमान छी हो



एक जमान उले हुछि , 
द्वारो मी म्योर गौंव वाल ताई नी लगुछी  , 
गौंव मी एकेक पीड़ , 
सब गौंव वालू पीड़ हुछि।  

मिल जुल बेर सब काम हुछि , 
बूढ़ बाड़िया खूब पूछ हुछि ,
नानतिन सब दगडे खेलछि , 
राती बटे ब्याव गौंव आबाद रुछि।  

नौव पाणी हुछि , 
बांजाक बूझाणि हुछि , 
जंगओ मी काफल और बमौर पाकछि,
पूरा गौंव एक धात मी इकट्ठ हुछि।  

साग -पाताक ऐच पेच हुछि ,
एक घरेक धिनाय सबु चाह रंगुछि,
गौव  स्याणु दीबे सब डरछी ,
पूरा गौव एक परिवार बड़ बेर रुछि।   

बखत बदलौ , सब बदेई गो 
म्योर गौव ले अब संस्कार भूल गो , 
तलिहु जाणे दौड़ लागी रै , 
येक चक्कर मी अब म्योर गौव हरेगो।  


कुमाउँनी शब्द और हिंदी अर्थ 

( जमान - समय , ताई - ताला , एकेक - एक की , पीड़ - दुःख दर्द , बूढ़ बाड़िया- बुजुर्ग , ब्याव - साँझ , धात - आवाज , एच पेच -लेन देन , धिनाय - दूध दही , स्याणु - बुजुर्ग , बखत - समय , बदेई- बदलना , तलिहु - मैदानी भाग , हरेगो - खोना, काफल और बमौर- स्थानीय फल  )

Friday, 22 February 2019

ईजा




इजेक फिक्र कभे कम नि हून ,
नानतिन ठुल ले हेगया ,
देश या परदेस ,
लाढ़ कभे कम नि हून।

आपुण पेट काट बेर ,
नानतिन पाई भायी ,
नजर नि लागो केकी ,
कदूक जतन करि भायी। 

आईले , ईज दिन रात प्रार्थना करुँ
नानतिन जाले रौ ,
हँसी ख़ुशी रौ ,
दुःख उनौर नजदीक नी ओ। 

इजोक दिल कभे झन दुखाया ,
वी हभे ठुल पाप के नेह ,
भगवानोक अवतार छू ऊ ,
ईज हभे क्वो ठुल नेह। 



कुमाउँनी शब्द और उनके हिंदी अर्थ
( नेह - नहीं , ईजा - माता जी , नानतिन - बच्चे , क्वो- कोई , लाढ़ - प्यार और स्नेह , कभे - कभी भी , ठुल - बड़ा  , उनौर- उनके, कदूक- बहुत )

Thursday, 21 February 2019

भौते जाड़



ह्यू पड़ गो डाना-काना ,
सफ़ेद चद्दर जस बिछी गो , 
ग्वोर बाछ अरणी गी , 
यस ह्यून कू बजर पड़ी जो।  

आगेक मुत्थि बैठण भौल लागि गो ,
बूढ़ बाड़ियाक बाई पीड़ फिर जाग गो , 
अड़कसे हेगो यौ फेरा दाज्यू , 
रम पी बेर ले ठंड लागि गो।  

पाणी कलकलाट हेगो , 
सूखी लकाड़ोक धुआँठ हेगो ,
आण - काथ निमड़ गी अब, 
अब तो जा ठण्डा , फागुन एगो।   



( ह्यु - बर्फ , अरणी - ठंडा पड़ना , आण - काथ- पहेलियाँ , कहानी ; लकाड़ोक- लकड़ियां ; निमड़- ख़त्म होना ) 

Wednesday, 2 January 2019

कुमाऊँ का मकर संक्रांति पर्व- घुघतियाँ



मकर संक्रान्ति का त्यौहार इस बार १४ जनवरी को है और यह पूरे देश में अलग अलग नाम से मनाया जाता है।  उत्तराखंड में इस त्यौहार को उत्तरायणी के नाम से भी जाना जाता है।  कहते है इसी दिन से दिन बढे होने शुरू हो जाते है।   बागेश्वर में सरयू किनारे उत्तरायणी का मेला लगता है।   कुमाऊं मंडल में इस त्यौहार को " घुघुतिया " नाम से मनाया जाता है।  "घुघुतियाँ " मनाने के पीछे बहुत सी दन्त कथाएं प्रचलित है जो तार्किक भी लगती है और इसी वजह से यह त्यौहार लोक उत्सव भी बन जाता है।   
इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन " घुघुत " बनाये जाते है। 

सबसे पहले पानी गरम करके उसमें गुड़ डालकर चाश्नी बना ली जाती है, फ़िर आटा छानकर इसे आटे में मिलाकर गूँथ लिया जाता है। जब आटा रोटी बनाने की तरह तैयार हो जाता है तो आटे की करीब ६” लम्बी और कनिष्का की मोटाई की बेलनाकार आकृतियों को हिन्दी के ४ की तरह मोड़्कर नीचे से बंद कर दिया जाता है। इन ४ की तरह दिखने वाली आकृतियों को स्थानीय भाषा में घुघुते कहते हैं। घुघुतों के साथ साथ इसी आटे से अन्य तरह की आकृतियाँ भी बनायी जाती हैं, जैसे अनार का फ़ूल, डमरू, सुपारी, टोकरी, तलवार आदि; पर सामुहिक रूप से इनको घुघूत के नाम से ही जाना जाता है।

आटे की आकृतियाँ बन जाने के बाद इनको सुखाने के लिए फ़ैलाकर रख दिया जाता है। रात तक जब घुघुते सूख कर थोड़ा ठोस हो जाते है तो उनको घी या वनस्पति तेल में पूरियों की तरह तला जाता है। फिर बनायीं जाती है मालाएं , जिन्हे बच्चे अगले दिन सुबह सुबह गले में डालकर चिल्लाते है - " काले कौव्वे काले , घुघूती माला खा ले "

सुबह एक कटोरे में कुछ घुघते, बड़े और पूरियाँ डालकर घर की छत या खुले में रख दिए जाते है और फिर "कौव्वे" आकर उन्हें उठा ले जाते है और उनको कही छुपाकर फिर दूसरे घर की तरफ चले जाते है।  साल भर दुत्कार खाने वाला यह पक्षी उस दिन बड़ा सम्मानीय हो जाता है।   

आप अगर १५ जनवरी को कुमाऊं की तरफ जाएँ और सुबह सुबह अगर ये शोर सुनने को मिले तो समझ जाइएगा की " घुघुत " खाने के लिए कौवो को बुलाया जा रहा है। 
बाकि घुघतो को बड़े चाव से खाया जाता है और यह पकवान जल्दी ख़राब भी नहीं होता।   तो तैयार रहिये " घुघतियाँ ' मनाने को और इस बार एक घुघुत विश्व शांति के लिए भी माला में पिरो लीजियेगा और हां , बच्चो की माला में संतरे या और कोई फल भी गूँथ लीजियेगा , घर में बरकत रहेगी।