Wednesday, 20 May 2020

सुमित्रानंदन पंत जी का जन्मदिन



कवि जगत के अपने पुरोधा को , 
आज सदर नमन और अभिनन्दन , 
रचा बसा था जिनके अंदर पहाड़ , 
कलम से निकली थी अटूट धार , 
वो " पंत " थे कौसानी से , 
धन्य किया जिन्होंने काव्य संसार।  

हे ! पूर्वज मेरे - कलम मैंने भी थामी है , 
पदचिन्हो पर आपके , 
कुछ दूर तक चलने की ठानी है , 
तुम बरगद से खड़े सामने , 
मैं अभी उगता झाड़।  

छायावाद के प्रमुख स्तंभ , 
युग पथ, सत्यकाम, शिल्पी, सौवर्ण, चिदम्बरा, पतझड़, रजतशिखर, तारापथ के रचनाकार , 
धन्य हुई वो भूमि , 
जहाँ जन्मे शब्दों के आप शिल्पकार।  



Wednesday, 18 March 2020

पत्थर फूल




पहाड़ो में चीड़ के पेड़ो पर या बड़े से पत्थरो में पत्थर फूल खिला या चिपका हुआ देखा होगा।   बड़े काम की चीज है ये पत्थर फूल।   मुझे याद है बचपन में हम इसको इकट्ठा करके पत्थर में पानी के साथ पीसकर हाथो में लगाते थे , और सूखने के बाद ये मेहँदी जैसा लाल रंग देता था हाथ पर। 

लेकिन ये पत्थर फूल मसालो के परिवार का हिस्सा है और मसाले के रूप में प्रयोग होता है - खासकर नॉन-वेज बनाने में इसका इस्तेमाल होता है।  बहुत सारे औषिधीय गुण भी शामिल होते है इसमें।   मजेदार बात ये हैं की ये एक फफूँद की तरह है जो पेड़ो और पत्थरो में अपने आप उगता है और प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से अपना भोजन बनाता और पनपता है। 
उसको पेड़ से या पत्थरो से निकालकर सुखाया जाता है और फिर मसाले के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।   यह पेट के विकार दूर करने में बहुत लाभदायक है।  भारत में अलग अलग जगह इसे अलग अलग नामो से जाना जाता है। 

Tuesday, 25 February 2020

लूकी गे छौ हमेर सरकार।



लुकी गे छौ सरकार ,
का गैयी हो सरकार ,
ढूँढो ढूँढो हो सौकार ,
लूकी गे छौ हमेर सरकार।

तात तेल खितो कानो मी ,
ठंडो  पाणील  जगाओ ,
जगाओ , जगाओ , जल्दी जगाओ ,
सी गे हमेर सरकार।

दून मी हाथेम हाथ धर ,
खुटम खुट धरी रे ,
जनता पहाड़ो में ,
विकासेक राह ताकी रे।

बजर पाड़ी हलो पहाड़ो कू ,
न छे क्ये रोज़गार ,
सब तलहुँ लेहगी ,
को खोलल अब घरेक द्वार।

समेरा समेर हेरै ,
विधायक ज्यू हूनी मालामाल ,
चार आनेक काम नि हुनोय ,
खर्च देखूनि  हजार।

लुकी गे छौ सरकार ,
का गैयी हो सरकार ,
ढूँढो ढूँढो हो सौकार ,
लूकी गे छौ हमेर सरकार।

Wednesday, 19 February 2020

"कुमाऊँ का इतिहास " - बद्रीदत पाण्डे


हर भौगोलिक क्षेत्र का अपना एक इतिहास रहा है।   भूभाग की सरंचना , रहने वाले लोग , उनका आचार व्यवहार - उनके इतिहास से ही जुड़ा होता है।  कुमाऊं का इतिहास नामक पुस्तक बद्री दत्त पाण्डे की रचित पुस्तक है जो उन्होंने 1932 से 1937 के दौरान लिखी है।  लगभग सात सौ पृष्ठो से सज्जित इस किताब को पाण्डे जी ने सात भागो में विभक्त किया है।  पहला भाग - भौगोलिक और ऐतिहासिक वर्णन , दूसरा भाग - वैदिक और पौराणिक वर्णन , तीसरा भाग -कत्यूरी शासन काल, चौथा भाग - चंद शासन काल , पाँचवा भाग - गोरखा शासन काल , छठा भाग - अँग्रेजी शासन काल और सातवां भाग - मनुष्य , जातियाँ , रस्मो-रिवाज , मंदिर , धर्म आदि के वर्णन से सज्जित है। 

इस किताब को लिखने के पीछे का कारण उनका अत्यधिक व्यक्तिगत था।  इस बात को वो  किताब के आरम्भ में बता देते है की बरेली जेल में कैद के दौरान ही उन्हें सूचना प्राप्त हुई की उनके पुत्र तारकनाथ की बनारस में नहाते वक्त डूबने से मृत्यु हो गयी और इस गम में उनकी पुत्री जयंती देवी ने भी आत्महत्या कर ली तो अपने शोक को मिटाने  और ध्यान हटाने के लिए इस पुस्तक की रचना की। 

संक्षेप में , श्री बद्रीनाथ पांडे जी का यह मैराथनी प्रयास हम सबके लिए वरदान की तरह है।  तथ्य , आँकड़े कितने सच है और ये कहाँ से उद्घृत किये गए है - इसका भी इन्होने जिक्र किया है।  कितने सच है और कितने गलत ? ये अलग विषय है।  लेकिन कुमाऊं के इतिहास को समझने के लिए इस किताब को हर कुमाउँनी वासी को जरूर  पढ़ना चाहिए - ऐसा मेरा व्यक्तिगत मत है।  

Tuesday, 18 February 2020

क्या है मेरी किताब " मिगमीर सेरिंग और २१ अन्य कहानियाँ " में ?



मिगमीर सेरिंग और २१ अन्य कहानियाँ - २२ कहानियां का सँग्रह है।   वस्तुतः ये कहानियाँ नहीं है , ये आपबीती और जगबीती की आँखों देखी है।   चूकि पहाड़ी हूँ , पहाड़ो से तालुकात रखता हूँ तो बहुत सी कहानियों की पृष्ठ्भूमि पहाड़ो की है।   मानवीय संवेदनाओ को समझने वाले इस किताब से अपने को भी जोड़ के देख सकते है। 
यह किताब किसी बुक स्टाल पर उपलब्ध नहीं है।   किताब को सिर्फ ऑनलाइन वेबसाइट में जाकर ही खरीदा जा सकता है।   अगर आप इच्छुक है तो इसे इस लिंक पर से खरीद कर मँगा सकते है - https://pothi.com/pothi/book/anand-mehra-migmir-tsering

उम्मीद करता हूँ की ये बयानात आपको पसंद आएंगे।  

Friday, 17 January 2020

पलायन



पहाड़ो से मैदानों में उतरायन हमेशा ही सरल रहा है क्यूंकि आपको ज्यादा थकान नहीं होती , मगर उतरने में पैरो में अतिरिक्त बोझ पड़ता है और चूँकि गुरुत्वाकर्षण का मामला है और आप मैदानों की तरफ बड़ी सरलता से उतर जाते हो।   एक बार जब आप मैदानों में पहुँच जाते हो तो फिर आप पहाड़ चढ़ने के संघर्ष को सोचकर ही कपकँपाने लगते हो। 
यही डर फिर आपको पहाड़ो से दूर करने लगता है और फिर धीरे धीरे आपके अंदर का पहाड़ी मन , मैदानी हो जाता है और आप पहाड़ो से दूर होते जाते हो।  फिर मैदानी भाग का जीवन संघर्ष आपको पहाड़ चढ़ने से कमतर लगने लगता है और आप "मैदानी " हो जाते हो। 

पहाड़ आपकी राह ताकता रहता है और आप "मैदानी " बनकर उसे भूल जाते हो और चंद वर्षो में पहाड़ भी आपके रिक्त स्थान को कुछ घास  उगाकर भर लेता है और धीरे धीरे वह घास या कोई पेड़ आपकी रिक्तता को भर देता है।  फिर पहाड़ आपको भूल जाता है , मगर , आपका पहाड़ी मन कुलांचे मारता है मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और आप फिर "मैदानी " बने रहने के पहाड़ो के श्राप से ग्रसित हो जाते हो। 

अंत में , न आप पहाड़ी रह जाते हो और न पूर्णरूपेण मैदानी।  यही यथार्थ है और यही कटु सत्य।  

Saturday, 14 December 2019

ताजी बर्फ और गुड़



ये फोटो अनायास ही मुझे मेरे बचपन में ले गया।   मैं मूलतः अल्मोड़ा ज़िले के सोमेश्वर क्षेत्र के एक छोटे से गाँव का निवासी हूँ और अब आजीविका के लिए दिल्ली में रहता हूँ।   कल पहाड़ो में भारी बर्फ़बारी हुई तो किसी ग्रुप में ये फोटो वायरल होकर मुझ तक पहुँची। 

मेरा बचपन भी गाँवों में बीता और जब छोटा था तो हम भी थाली लेकर गिरती ताजी बर्फ इकठ्ठा करते थे और फिर घर के अंदर जाकर गुड़ के साथ खाते थे।  वो शायद हमारे लिए उस समय आइसक्रीम का काम करती थी।   मगर ताज़ी बर्फ का स्वाद , फ्रिज में जमे बर्फ से बहुत अलग होता है।   और जब ये ताज़ी बर्फ की फाँके गुड़ के साथ मुँह में घुलती थी , मजा आ जाता था। 

पहाड़ो में अभी और बर्फ गिरेगी , तो कोशिश करियेगा - ताजी बर्फ और गुड़ की आइस क्रीम।