Monday, 25 February 2019

एक जमान छी हो



एक जमान उले हुछि , 
द्वारो मी म्योर गौंव वाल ताई नी लगुछी  , 
गौंव मी एकेक पीड़ , 
सब गौंव वालू पीड़ हुछि।  

मिल जुल बेर सब काम हुछि , 
बूढ़ बाड़िया खूब पूछ हुछि ,
नानतिन सब दगडे खेलछि , 
राती बटे ब्याव गौंव आबाद रुछि।  

नौव पाणी हुछि , 
बांजाक बूझाणि हुछि , 
जंगओ मी काफल और बमौर पाकछि,
पूरा गौंव एक धात मी इकट्ठ हुछि।  

साग -पाताक ऐच पेच हुछि ,
एक घरेक धिनाय सबु चाह रंगुछि,
गौव  स्याणु दीबे सब डरछी ,
पूरा गौव एक परिवार बड़ बेर रुछि।   

बखत बदलौ , सब बदेई गो 
म्योर गौव ले अब संस्कार भूल गो , 
तलिहु जाणे दौड़ लागी रै , 
येक चक्कर मी अब म्योर गौव हरेगो।  


कुमाउँनी शब्द और हिंदी अर्थ 

( जमान - समय , ताई - ताला , एकेक - एक की , पीड़ - दुःख दर्द , बूढ़ बाड़िया- बुजुर्ग , ब्याव - साँझ , धात - आवाज , एच पेच -लेन देन , धिनाय - दूध दही , स्याणु - बुजुर्ग , बखत - समय , बदेई- बदलना , तलिहु - मैदानी भाग , हरेगो - खोना, काफल और बमौर- स्थानीय फल  )

Friday, 22 February 2019

ईजा




इजेक फिक्र कभे कम नि हून ,
नानतिन ठुल ले हेगया ,
देश या परदेस ,
लाढ़ कभे कम नि हून।

आपुण पेट काट बेर ,
नानतिन पाई भायी ,
नजर नि लागो केकी ,
कदूक जतन करि भायी। 

आईले , ईज दिन रात प्रार्थना करुँ
नानतिन जाले रौ ,
हँसी ख़ुशी रौ ,
दुःख उनौर नजदीक नी ओ। 

इजोक दिल कभे झन दुखाया ,
वी हभे ठुल पाप के नेह ,
भगवानोक अवतार छू ऊ ,
ईज हभे क्वो ठुल नेह। 



कुमाउँनी शब्द और उनके हिंदी अर्थ
( नेह - नहीं , ईजा - माता जी , नानतिन - बच्चे , क्वो- कोई , लाढ़ - प्यार और स्नेह , कभे - कभी भी , ठुल - बड़ा  , उनौर- उनके, कदूक- बहुत )

Thursday, 21 February 2019

भौते जाड़



ह्यू पड़ गो डाना-काना ,
सफ़ेद चद्दर जस बिछी गो , 
ग्वोर बाछ अरणी गी , 
यस ह्यून कू बजर पड़ी जो।  

आगेक मुत्थि बैठण भौल लागि गो ,
बूढ़ बाड़ियाक बाई पीड़ फिर जाग गो , 
अड़कसे हेगो यौ फेरा दाज्यू , 
रम पी बेर ले ठंड लागि गो।  

पाणी कलकलाट हेगो , 
सूखी लकाड़ोक धुआँठ हेगो ,
आण - काथ निमड़ गी अब, 
अब तो जा ठण्डा , फागुन एगो।   



( ह्यु - बर्फ , अरणी - ठंडा पड़ना , आण - काथ- पहेलियाँ , कहानी ; लकाड़ोक- लकड़ियां ; निमड़- ख़त्म होना ) 

Wednesday, 2 January 2019

कुमाऊँ का मकर संक्रांति पर्व- घुघतियाँ



मकर संक्रान्ति का त्यौहार इस बार १४ जनवरी को है और यह पूरे देश में अलग अलग नाम से मनाया जाता है।  उत्तराखंड में इस त्यौहार को उत्तरायणी के नाम से भी जाना जाता है।  कहते है इसी दिन से दिन बढे होने शुरू हो जाते है।   बागेश्वर में सरयू किनारे उत्तरायणी का मेला लगता है।   कुमाऊं मंडल में इस त्यौहार को " घुघुतिया " नाम से मनाया जाता है।  "घुघुतियाँ " मनाने के पीछे बहुत सी दन्त कथाएं प्रचलित है जो तार्किक भी लगती है और इसी वजह से यह त्यौहार लोक उत्सव भी बन जाता है।   
इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन " घुघुत " बनाये जाते है। 

सबसे पहले पानी गरम करके उसमें गुड़ डालकर चाश्नी बना ली जाती है, फ़िर आटा छानकर इसे आटे में मिलाकर गूँथ लिया जाता है। जब आटा रोटी बनाने की तरह तैयार हो जाता है तो आटे की करीब ६” लम्बी और कनिष्का की मोटाई की बेलनाकार आकृतियों को हिन्दी के ४ की तरह मोड़्कर नीचे से बंद कर दिया जाता है। इन ४ की तरह दिखने वाली आकृतियों को स्थानीय भाषा में घुघुते कहते हैं। घुघुतों के साथ साथ इसी आटे से अन्य तरह की आकृतियाँ भी बनायी जाती हैं, जैसे अनार का फ़ूल, डमरू, सुपारी, टोकरी, तलवार आदि; पर सामुहिक रूप से इनको घुघूत के नाम से ही जाना जाता है।

आटे की आकृतियाँ बन जाने के बाद इनको सुखाने के लिए फ़ैलाकर रख दिया जाता है। रात तक जब घुघुते सूख कर थोड़ा ठोस हो जाते है तो उनको घी या वनस्पति तेल में पूरियों की तरह तला जाता है। फिर बनायीं जाती है मालाएं , जिन्हे बच्चे अगले दिन सुबह सुबह गले में डालकर चिल्लाते है - " काले कौव्वे काले , घुघूती माला खा ले "

सुबह एक कटोरे में कुछ घुघते, बड़े और पूरियाँ डालकर घर की छत या खुले में रख दिए जाते है और फिर "कौव्वे" आकर उन्हें उठा ले जाते है और उनको कही छुपाकर फिर दूसरे घर की तरफ चले जाते है।  साल भर दुत्कार खाने वाला यह पक्षी उस दिन बड़ा सम्मानीय हो जाता है।   

आप अगर १५ जनवरी को कुमाऊं की तरफ जाएँ और सुबह सुबह अगर ये शोर सुनने को मिले तो समझ जाइएगा की " घुघुत " खाने के लिए कौवो को बुलाया जा रहा है। 
बाकि घुघतो को बड़े चाव से खाया जाता है और यह पकवान जल्दी ख़राब भी नहीं होता।   तो तैयार रहिये " घुघतियाँ ' मनाने को और इस बार एक घुघुत विश्व शांति के लिए भी माला में पिरो लीजियेगा और हां , बच्चो की माला में संतरे या और कोई फल भी गूँथ लीजियेगा , घर में बरकत रहेगी। 

Monday, 24 December 2018

आण- काथ ( पहेलियाँ और कहानियाँ )


उत्तराखंड में अधिकतर भागो में कड़ाके की ठंड पड़ती है और सर्दियों के दिनों में सूरज भी जल्दी ढल जाता है।   राते लम्बी होती है।   एक वह दौर था , जब टीवी और मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करते थे।   उस समय रात को बड़े बूढ़े या ईजा  आण- काथ सुनाकर समय व्यतीत करती थी।   एक कहानी मैंने भी बचपन में बहुत सुनी थी - " चल तुमड़ी बाट बाट , मैके जाणु बुड़ीय बात "

पहलियों को आण कहा जाता था जैसे " भम बुकि , माट मी लुकी " का उत्तर - मूली होता था।   घर के छोटे , नौजवान और बुजुर्ग अंगीठी में कोयला जलाकर एक जगह आग तापते थे और फिर मूंगफली या भुने भट्ट खाये जाते थे और फिर शुरू होता था - आण- काथ का दौर।  परिवार के बुजुर्ग अपने अनुभव साझा करते थे , खूब हंसी ख़ुशी का दौर चलता था।   सबसे बड़ी बात वो आग की अँगीठी या सँगेड़ी सारे परिवार को एकजुट कर देती थी।   सब गिले - शिकवे उसी अँगीठी के इर्द गिर्द सुलझ जाते थे। 

बाँज के लकड़ियों के कोयले बहुत देर तक गर्मी देते थे और चीड़ के फल जिसे " ठीठे " कहा जाता था , बड़ी जल्दी राख हो जाते थे। वो दौर ऐसा था , जिसमे सबके लिए एक दूसरे के लिए समय होता था।   


अब शायद   "आण- काथ " की जगह टीवी और मोबाइल ने ले लिया है और अँगीठी जलनी अब बंद सी हो गयी है और परिवार वालो के पास भी अब वक्त थोड़ा कम हो चला है।  कुछ परम्पराएं हमेशा जीवित रहनी चाहिए और शायद ये परम्परा उन्ही में से एक थी।  

Tuesday, 18 December 2018

घर के प्रति प्रेम, समर्पण और सम्मान का प्रतीक - ऐपण



किसी भी क्षेत्र की लोककला तभी तक जीवित रहती है जब तक लोग उस लोक कला को अपने जीवन का एक अभिन्न अंग समझे।  यह लोक कलाओ पीढ़ी दर पीढ़ी एक हाथ से दूसरे हाथो में स्थान्तरित होते रहती है।   बिना कोई लिखित नियम के ये लोककलाएं सदियों से पल्लवित और विकसित होते रहती है।   उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में एक लोक कला का सुन्दर रूप होता है - ऐपण।   किसी भी शुभ अवसर पर जब घर की दहलीज में ऐपण से चित्र उभरते है तो ऐसा लगता है जैसे ये कला नहीं , जीवन का हिस्सा है। 

ऐपण शब्द का उद्गम संस्कृत शब्द "अर्पण" से है और यह एक तरह से घर की दहलीज को धन्यवाद कहने का माध्यम भी है जो घरवालों को सुरक्षित और संयमित रखता है । इसमें घरों के आंगन से लेकर मंदिर तक प्राकृतिक रंगों जैसे गेरू एवं पिसे हुए चावल के घोल (बिस्वार) से विभिन्न आकृतियां बनायी जाती है। जब गेरुवे रंग के ऊपर इस बिस्वार ( सफ़ेद ) से हाथो से लकीरे खींची जाती है तो ऊ , लक्ष्मी माता के चरण , और भी न जाने परिकल्पनाएं उढ़ेल दी जाती है और बन जाता है - लोक कला का एक विशिष्ट नमूना - ऐपण।  अलग अलग मांगलिक अवसरों पर ऐपण को भी अलग तरह से परिकल्पित किया जाता है।   सधी हुई अंगुलियाँ जब गेरुवे या लाल रंग के ऊपर सफ़ेद रंग की लकीरे खींचती है तो जैसे कला जीवंत हो उठती है।  सीढ़ियों पर भी लकीरे उकेरी जाती है। 

खुशकिस्मती है की एक बार विलुप्ति की कगार पर पहुंच गयी इस लोक कला को फिर से जीवंत करने का भरसक प्रयास किया जा रहा है और इसके परिणाम भी सुखद आ रहे है।  बाजार में रेडीमेड ऐपण प्रिंट भी आने लगे है मगर गाँवों में आज भी गेरुवे और बिस्वार से बनायीं जाने वाली ऐपण कला जीवित है।   वैसे भी हमारी पहाड़ी संस्कृति में बिना ऐपण के कोई नहीं मांगलिक कार्य अधूरा सा लगता है।   जरुरी है की यह परम्परा जीवित रहे और हमारा कर्तव्य है की हम इस कला और इसकी महत्ता को अपनी आने वाली पीढ़ी तक भी पहुचायें। 

घर की दहलीज पर बना ये ऐपण जैसे बोल उठता है की आओ , जजमानो आप सबका स्वागत है। 

जय देवभूमि , जय उत्तराखंड। 

Image Source - Google 

Friday, 14 December 2018

साहस , विश्वास और शौर्य का युद्ध नृत्य है - छोलिया नृत्य





छोलिया नृत्य को स्मरण करते ही पहाड़ो की शादियों की याद आ जाती है जब कुछ छोल्यार हाथो में तलवार और ढाल लिए ढोलक ( दमाऊ ) की ताल पर अद्भुत नृत्य करते है।   जैसा ढोल बजता है , नर्तक  उसी अनुसार अपने शरीर के सब अंगो को हिलाते हुए अपनी भाव भंगिमाओं से देखने वालो को एक अलग ही दुनिया में ले जाते है। 

कहते है ख़स राजाओ के समय से यह नृत्य चला आ रहा है और जनश्रुतियो के अनुसार इस नृत्य शैली के विकसित होने का एक कारण बड़ा प्रचलित है।   उस काल में जब कोई राजा युद्ध जीतकर आया तो वह युद्ध की कहानी अपनी रानियों को सुना रहा था तो रानियां बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने भी युद्ध देखने की इच्छा जताई मगर सामाजिक बंधनो और सुरक्षा का हवाला देकर राजा ने उनकी इच्छा को अस्वीकार कर दिया मगर युद्ध क्षेत्र में क्या होता है , वो प्रतीकात्मक तौर पर अपनी रानियों को दिखाने के लिए उसने राजदरबार में ही युद्ध क्षेत्र को रचने का निर्णय लिया और दो गुट  बनाकर उन्हें सैनिको जैसे कपडे और तलवार , ढाल दिए और दमाऊ की आवाज पर उन्हें अभिनीत करने का आदेश दिया।   यह नृत्य  राजदरबारियों और रानियों को बहुत पसंद आया और फिर इसका आयोजन हर साल होने लगा।   कालान्तर में यह नृत्य कुमाऊँ क्षेत्र में जन नृत्य बन गया  और फिर धीरे धीरे शादियों में भी किया जाने लगा। 

यह एक तलवार नृत्य है, जो प्रमुखतः शादी-बारातों या अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है। यह विशेष रूप से कुमाऊँ मण्डल के पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और अल्मोड़ा जिलों में लोकप्रिय है।

इस नृत्य में नर्तक युद्ध जैसे संगीत की धुन पर क्रमबद्ध तरीके से तलवार व ढाल चलाते हैं, जो कि अपने साथी नर्तकियों के साथ नकली लड़ाई जैसा प्रतीत होता है। वे अपने साथ त्रिकोणीय लाल झंडा (निसाण) भी रखते हैं। नृत्य के समय नर्तकों के मुख पर प्रमुखतः उग्र भाव रहते हैं, जो युद्ध में जा रहे सैनिकों जैसे लगते हैं।

इसके अतिरिक्त छोलिया नृत्य का धार्मिक महत्व भी है। इस कला का प्रयोग अधिकतर राजपूत समुदाय की शादी के जुलूसों में होता है। छलिया को शुभ माना जाता है तथा यह भी धारणा है की यह बुरी आत्माओं और राक्षसों से बारातियों को सुरक्षा प्रदान करता है।

छोलिया नृत्य में कुमाऊं के परंपरागत वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें तुरी, नागफनी और रणसिंह प्रमुख हैं।
नर्तक पारंपरिक कुमाउँनी पोशाक पहनते  हैं, जिसमें सफेद चूड़ीदार पायजामा, सिर पर टांका, रंगीला चोला तथा चेहरे पर चंदन का पेस्ट शामिल हैं। तलवार और पीतल की ढालों से सुसज्जित उनकी यह पोशाक दिखने में कुमाऊं के प्राचीन योद्धाओं के सामान होती है। 


अब आमतौर पर यह नृत्य रंगमंच पर या यदाकदा ही किसी शादी में देखने को मिलता है।  राज्य सरकार को इस नृत्य के सरंक्षण के उपाय सुनिश्चित करने चाहिए ताकि सदियों से चली आ रही यह नृत्य विधा विलुप्त न हो जाये।