Thursday, 16 July 2026
Friday, 14 November 2025
बूढ़ी अम्मा
पहाड़ सी ज़िन्दगी हो गयी ,
सब कुछ होते हुए भी कुछ न था ,
सब छोड़कर अकेले उसे ,
पहाड़ ही कर गए थे।
जिद्दी अम्मा भी थी ,
कितना समझाया था उसे ,
चली जा तू भी वही ,
न जाने क्यों पहाड़ों से इतना लगाव था।
हिस्से उसके संघर्ष के क्या आया था ,
रोज़ पहाड़ जैसी मुसीबतें ,
उकाव -हुलार चढ़ते -उतरते ,
हाथों से लकीरें भी गायब थी।
अम्मा रोज़ डूबते सूरज को ,
हुक्का पीते हुए निहारती थी ,
आज रात ही निकल जाये प्राण ,
अगले दिन खेतों में मिलती थी।
अपने बाड़ -खुड़ों से उसे अथाह प्रेम था ,
किसी में पालक , किसी में प्याज ,
नन्ही -नहीं क्यारियों में कपोल फूटती थी ,
अम्मा मन ही मन संतुष्ट होती थी।
लौकी और गद्दुऐ सूखा रखे थे घर की छत पर,
पीली ककड़ियों की बड़िया बनाती थी ,
खुद का कल का पता नहीं था ,
पूरे ह्यून बिताने का इंतजाम करती थी।
एक दिन सच में रात को सोई ,
सुबह उठी ही नहीं ,
बड़िया छत में ओंस में भीग गयी ,
और पालक तुश्यार से मुरझा गयी।
अम्मा चुपचाप चली गयी ,
और सब कुछ छोड़ गयी ,
बच्चे भी अम्मा की चिंता से फरांग हो गये ,
गाँव वालों ने कहा - बुढ़िया तर गयी।
Friday, 7 November 2025
कुमाउँनी फसक
लेखने लेखने हाथ पट्टे गी , कलमक टूटी टाँकी ,
इंटरनेट पहुँच गो घर घर मी , अब क्ये लेखु बाकी। १।
बवाल मचे हले मोबाइलेल , नानतिन सब बिगाड़ हाली।
रील बढ्नु चस्क लाग गो , किताब बाझ हाली। २।
न्यूत पात सब व्हाट्सप्प हेगो , सामान ऑनलाइन एगो। ।
बूढ़ आमा धात लगनु , ब्व्यार इंस्टाग्राम रील देखण मी पट्टे
गे। ३।
ग्वोर -बाछ को पाऊ अब , खेती बाणी मी बजर पड़ी गो ।
फ्री राशन मी मगन छीन , गोठ बट्टी भतेर तक फरांग हेगो। ४।
Friday, 10 October 2025
बजर पड़ गौ
सरकारेक फ्री राशन बट्टी ,
पहाड़ों मी खेती कू बजर पड़ गौ।
हाथ -हाथ मी मोबाइल ,
काम धंध मी बजर पड़ गौ।
साग पात ,फल फूल उजड़ गयी ,
बानर हेगी बेहिसाब , बजर पड़ गौ।
द्वी मिनट मी मैग्गी बण जाने ,
लेसु रवाटो मी बजर पड़ गौ।
सब जाण फैगी पहाड़ छोड़ बेर ,
गौ -गौनो मी बजर पड़ गौ।
Monday, 6 October 2025
असोज
असोज सिमरु ऐ जा ब्वारी ,
कहाणेक है रै चुटाचुट,
धानक थुपड़ भिझ जानिइये ,
घा काटी बेर खितेड छीन लुट।
नान्तिनो कू चाडों टेम नेहे ,
खाण पीणो काकू ध्यान है रौ ,
हौ -भान कारण छीन ,
खौह मी है रै दै।
काव लाग रौ यौ असोज कू ,
सिमरेन सिमरने आफत ऐ रै ,
झन कै ब्वारी -भट भेज दियो ,
भटाल म्येरि कमर तोड़ रै।
मडु टीपेन -टीपने हाथ पटे गी ,
अखोड़ बौठम बट्टी बानर हीलेगी ,
बजर पड़ जो यौ असोजक मेहण कू ,
काम ज्यादेक , भकार खाली रुण।
Wednesday, 16 July 2025
पधानी चुनाव
भौते मुश्किल हू पधान चुनेण मी ,
नानू -नान गौव म्हे ठाण है जानि पाँच ,
क्वे बिरादर , क्वे रिश्तेदार ,
क्वे ठुल , क्वे कका , क्वे नान ,
वोट काकू दू , खौर परेशान।
बड़ मुश्किल छू हो दाज्यू ,
काकू वोट दीढ़ छू ,
मुनापीढ़ छू रोज़ ,
लोकसभा , विधानसभा हबे ,
मुश्किल छू चुनण गौव पधान।
केके चिन्ह अन्नानास ,
केके उगता सूरज ,
केकू मिल जा अनाज की बाली ,
केकु मोराक फाँख,
गजबजी जा हाथ , खौर परेशान।
ऊ कू मी यौ करन ,
दुहोर कू मी करन विकास ,
चुनाव जीत बेर ,
लाट साहब बण जानी ,
हर गौव ग्राम पधान।
सरासर सिमरनि पधान ज्यू ,
लैंटर वाल घर बढ़े लीन्ही ,
पुराण बिछाई खडंच मी ,
नई डुंग बिछे दीनी,
कामे बखत मी ,
पधान पत न का लुक जानी।
Monday, 9 January 2023
जोशीमठ
दरारें ,
गवाह है ,
हमारे लालच की ,
दरारें ,
सबूत है ,
हमारे कर्मों की ,
दरारें ,
प्रतीक है ,
हमारे स्वार्थ की ,
दरारें ,
परिणाम है ,
प्रकृति से दुःसाहस की।
दरारें ,
सूचक है ,
हमारी बेलगाम प्रवृति की।
जोशीमठ ,
टूट रहा है,
रिस रहा है,
धँस रहा है,
रो रहा है ,
कौन सुने पीड़ा ,
जोशीमठ की,
न जाने कल ,
किस पहाड़ की बारी।
- आनन्द मेहरा
ग्राम -कोटुली , पोस्ट - रणमण , अल्मोड़ा ( उत्तराखंड )
Tuesday, 30 August 2022
दाज्यू , कस जमान एगो
दाज्यू , कस जमान एगो ,
फाटि सुराव फैशन हैगो ,
पैलाग -ज्यूजा ख़त्म हैगे ,
"गुड" अब सब हैगो ,
ईज अब "मम्मी " हैगे ,
बौज्यू अब "डैड " हैगो ,
भगवान अब "डबल " हैगो ,
न्युत -पात सब व्हाट्सप्प हैगो ,
ताल बखव बटी वीडियो कॉल हैगो ,
भाव भंगिमा इजहार बंद हैगो ,
शब्द हबे ज्यादा "इमोजी " हैगो,
दै -दूध ,धिनाइ सब पट हैगो ,
पैकेट मी दूध सब घर एगो ,
आठ फेल नेता बड़ गो ,
बी ए पास हयी हैगो ,
नान्तिना पढ़ाई चौपट हैगे ,
हाथ -हाथ मी मोबाइल एगो,
नानतिन सब पब्लिक स्कूल जाणी ,
प्राइमरी पाठशाला बस नामक रैगो ,
गौ -गाड़ सब खाली हैगो ,
पहाड़ सब हल्द्वाणी ,दून बसीगो ,
गोठ -भतेर सब सिसूण जामगो
खेत -खलिहान सब बंजर हेगो ,
राशन -पाणी सब मौल हेगो,
ऐच -पेच सब ख़त्म हैगो ,
सबसे ठुल डबल हैगो ,
बूढ़ -बाढ़िया बात किचाट हैगो ,
फ़िल्मी गीतों चीचाट हैगो ,
दाज्यू , कस जमान एगो ,
मैस बट्टी भौल मैस हरेगो।
Wednesday, 24 August 2022
आम्म -बुबु बात
जब जाले अल्माड़ ,तब लागल गलमाड़,
तब पत लागौल - कदु बीसी हुनि सैकाड़ ,
आसान नेह च्यला ज़िन्दगी काटण ,
बाट -बाट मी मिलाल काना बुज और झिलमोड़।
क्वो न क्वो हुनर हुण चे आपुण पास ,
बाजि बख्त काम एजा , क्ये लाज ,क्ये शर्म ,
पावण भय आपुण पेट , हाथ नि फैला ,
कर्म करते रूण भौव , जेठेक घाम मी तपा।
आलस नि कर,कर्मोल आपुण भाग जगा,
चार डबल कमाले , द्वी डबल बचा ,
बखत कभते ले फाव मार दयूं ,
दगड़ी बड़ सोच समेझ बेर बड़ा।
जो नौव पाणी पीण नेह , ऊ तरफे जे झन,
डाँस ढुंग कभे बड़िये झन, केके दिल दुखें झन,
सब पाख मी चढ़ला , तू धुरी मी चढ़िये झन ,
पोथिरा , जाले
रौले आपुण माट कू भूलिये झन।
Thursday, 5 May 2022
पहाड़ों से मैदान
मैं कौतूहलवश उतरा था ,
पहाड़ों से मैदानों में ,
मुझे बहुतों ने बताया था ,
स्वप्न नगरी है वहां ,
वहां हर सपना पूरा होता है ,
ऊंचे -ऊंचे मकान ,
सरपट दौड़ती लम्बी कारें ,
आँखें चौंधियाती रातें ,
मैं थोड़ा उकता सा गया था ,
एक धार से दूसरे धार ताक ,
क्या इतना ही है मेरा आकाश ,
चल दिया इक दिन ,
जो थोड़ा सामान था मेरे पास ,
खो सा गया मैदानों में आकर ,
जीवन बहुत था आसान ,
पल्ले में रुपये - पैसे हो ,
सब सपने यहाँ साकार ,
लगाई जुगत फिर कमाई की ,
मेहनत की अपार ,
न दिन देखा , न रात देखी ,
सहा जगह - जगह दुत्कार ,
मगर पत्थरों से सिर टकराने की ,
पहाड़ों की आदत बहुत आयी काम ,
भूलने लगा अपने गाड़ - गधेरे ,
लगने लगा अब न चढ़ पाउँगा ,
अपने गाँव का धार ,
कुछ मेहनत , कुछ किस्मत ,
कुछ मेरे बुजुर्गों और द्वाप्तो का आशीर्वाद ,
लेने लगे मेरे सपने आकार ,
मगर तब भी सपनों में ,
अक्सर आता रहा 'मेरा पहाड़ ',
भागमभाग तेज हुई ,
कदम मैं भी बढ़ाता गया ,
शहरी दौड़ में न जाने मेरा तन ,
कब शरीक हुआ ,
जोड़ -तोड़ कर कुछ हासिल तो किया ,
मगर वो सुकून को मेरा मन तरस गया ,
वो रास्ते टेढ़े -मेढ़े , उबड़ -खाबड़ ,
मेरे गाँव के जो मेरे घर तक जाते थे ,
वो नदी जिसकी कल -कल जगाती थी ,
वो हवा जो साँय - साँय बहती थी ,
वो पानी जो अमृत सा था ,
वो फूल , ताजे फल ,
शहरों में सब मोल था ,
जो मैं छोड़ आया था पीछे ,
अब उसी को खरीदने ,
पहाड़ छोड़कर शहर आ गया था।
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अगर आप पहाड़ो में यात्रा कर रहे हो और किसी पहाड़ी भोजनालय में खाना खाने जाये तो आपको पहाड़ी ककड़ी राई वाला रायता जरूर मिलेगा। एक मर्तबा...
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लेखने लेखने हाथ पट्टे गी , कलमक टूटी टाँकी , इंटरनेट पहुँच गो घर घर मी , अब क्ये लेखु बाकी। १। बवाल मचे हले मोबाइलेल , नानतिन सब...
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असोज सिमरु ऐ जा ब्वारी , कहाणेक है रै चुटाचुट, धानक थुपड़ भिझ जानिइये , घा काटी बेर खितेड छीन लुट। नान्तिनो कू चाडों टेम नेहे...

